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आरएनए-विषाणुओं की बढ़ती आबादी से लड़ने के लिए मनुष्य-जाति विवश है

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डॉक्टर स्कंद शुक्ला

चार्ल्स डार्विन ने कभी कहा था कि परिवर्तनशीलता (वेरिएबलिटी) मनुष्य (जानकर) नहीं पैदा करता। वह अनायास ही अपने व अन्य के जीवन को नवीन परिस्थियों के सामने प्रस्तुत कर देता है और प्रकृति इनमें परिवर्तन ले आती है।

आज दुनिया कोविड-19 पैंडेमिक से जूझ रही है, जिसका कारण एक कोरोना-विषाणु है। इसका नामकरण सार्स-सीओवी 2 किया गया है (क्योंकि सार्स-सीओवी 1 नामक एक पुराने विषाणु से इसे अलग नाम दिया जा सके)।

सार्स-सीओवी व इस जैसे तमाम कोरोना-विषाणुओं के पास डीएनए नहीं होता, अपने कैप्सिड नामक प्रोटीन के खोलों के भीतर ये आरएनए का एक टुकड़ा धारण करते हैं।

संरचना और क्रिया के स्तर पर आरएनए और डीएनए की संरचना में कुछ महत्त्वपूर्ण अन्तर हैं: जीव-विज्ञान के छात्र इन्हें लगातार पढ़ा करते हैं। विषाणुओं को भी आरएनए-डीएनए की उपस्थिति के आधार पर दो वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है: कुछ वायरस डीएनए-विषाणु होते हैं, जबकि अन्य आरएनए-विषाणु।

हर्पीज़ व पॉक्स-विषाणु डीएनए-विषाणुओं के उदाहरण हैं, जबकि कोरोनाविषाणु, एचआईवी व इबोला आरएनए-विषाणुओं के।

मानव-सभ्यता अपने विकास के साथ लगातार अन्तर-स्पीशीज़ रोग-प्रसार से जूझती रही है। अनेक रोगकारी कीटाणु (जिनमें जीवाणु-विषाणु व अन्य कीटाणु भी आते हैं) पशुओं से मनुष्यों में प्रवेश करते गये हैं। इस सूची में नवीनतम कोविड-19 का कारण सार्स-सीओवी 2 नवीनतम इज़ाफ़ा है।

ज़ूनोसिस के रूप में जाने जाने वाले रोगों की बड़ी संख्या की वजह ये आरएनए-विषाणु ही बने हुए हैं। इंसानों में होने वाले नये संक्रमणों में लगभग 44 % इन आरएनए-विषाणुओं के कारण पाये गये हैं ( जीवाणुओं , फफूँदों , प्रोटोज़ोआ और कृमियों ( हेल्मिन्थों ) की तुलना में कहीं अधिक )। ऐसे में प्रश्न यह ज़रूर मन में उठता है कि आरएनए-विषाणुओं की इतनी बड़ी आबादी मनुष्यों की ओर रुख़ क्यों कर रही है? (अथवा करती रही है?)

इन विषाणुओं का अध्ययन करते समय वैज्ञानिक कुछ विशिष्टताओं को रेखांकित करते हैं। ये ख़ास बातें ही आरएनए-विषाणुओं को डीएनए-विषाणुओं से अलग करती हैं और इन्हीं के कारण इनका अन्तर-स्पीशीज़ प्रसार होता रहा है। ये विषाणु तेज़ी से अपनी प्रतियाँ बनाते हैं (इनका जनरेशन-टाइम बहुत कम होता है) और नयी प्रतियाँ बनाते समय ये कई म्यूटेशनों से गुज़रते हैं। म्यूटेशन की यह दर डीएनए-विषाणुओं की तुलना में कई-कई गुना होती है।

इस लेख में जटिलता के कारण आरएनए-विषाणु का कोशिका के भीतर प्रति-निर्माण नहीं बताया जा रहा। पर इतना ज़रूर जानिए कि कोशिका के भीतर जब भी आनुवंशिक सामग्री की प्रजनन के लिए वृद्धि होती है, तब उसकी प्रूफ़-रीडिंग की जाती है। यह प्रूफ़ -रीडिंग यह तय करती है कि पुरानी आनुवंशिक सामग्री की बनायी गयी नकल में कहीं कोई गलती तो नहीं रह जा रही। नकल के समय यदि कोई भूल या दोष रह छूटा है, तब उसे सुधारने का यही समय है। इसे तरह से यथासम्भव सुधार करते हुए कोशिकाएँ अपनी जेनेटिक सामग्री में प्रजनन के समय वृद्धि करती है और नयी बनी कोशिकाओं में बाँटती हैं।

विषाणु भी यही करते हैं। कोशिका के भीतर अपनी जेनेटिक सामग्री की प्रतियाँ बढ़ाते समय वे उसकी प्रूफ़-रीडिंग करते जाते हैं। पर आरएनए-विषाणुओं में प्रूफ़-रीडिंग का यह काम ढंग से नहीं होता। नतीजन इन विषाणुओं में म्यूटेशन (यानी आनुवंशिक त्रुटियाँ) बढ़ते जाते हैं, जिसके कारण विषाणुओं का जेनेटिक स्वरूप बदलता जाता है।

सभी आरएनए-विषाणुओं को भी एक-सा समझना भूल होगी। एचआईवी अलग है और इबोला अलग। ज़ीका और सार्स में बहुत अन्तर हैं। पर आरएनए-विषाणुओं की बढ़ती आबादी से लड़ने के लिए मनुष्य-जाति विवश है, जो नित्य अपना स्वरूप बदलकर मानव-शरीरों में प्रवेश कर रहे हैं। यही नहीं इनके खिलाफ़ दवा और वैक्सीन के निर्माण में भी इनके लगातार बदल रहे स्वरूप मुश्किल पैदा किया करते हैं।

जो विविध हैं और लगातार बदल रहे हैं, उन हमलावरों पर वैज्ञानिकों को निशाना लगाना है। यक़ीनन यह आसान काम तो कतई नहीं है।

(लेखक लखनऊ स्थित डॉक्टर हैं और मेडिकल विषयों पर आम लोगों की बोलचाल में लिखने वाले लोकप्रिय लेखक हैं.)

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